KHUSH AAMDEED Aaiye bhatakte hai'n lafzo'n ki galiyo'n me'n or khoj nikalte hai'n ZOYA EHTRAM or ZAKARIYA FARMANI ke qalam se likhi kch aisi kahaniya'n, ghazle'n or nazm jo apke dil me'n utar jayegi, apke jazbat ko jhinjhod degi, kbhi hnsayegi to kbhi kbhi rulayegi, jin me'n aapko apna aap nazar ayega.....thodi aawargi, zra sa deewanapan, kahin mohabbat ke saye to kahin nafrat ki dhup, kahin khud aap to kahin apke samne basne wala koi roop..........
Friday, September 4, 2015
बन्द कमरे में क़ैद मुहब्बत
- दुनियां की इस हसीं वादि में सब खुश नज़र आते है कोई भी ऐसा नही जिसके हक़ में ये हक़ीर कुछ शिकायत कर ने पे मजबूर हो।
खैर ये दुनियां फानी है एक दिन इस खूबसूरत वादी को छोड़के कहीं दूर चला जाना है जहाँ न ऐसा हसीं मन्ज़र देखने को मिलेगा और न ही ऐसे दोस्त यार जिससे हम अपने दिल की बात share कर सकें खैर दोस्त की बात सामने आई तो एक शिकायत भी यार की याद आगई .... किसी ज़माने में जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे तब मेरा एक दोस्त अब्दुल कुद्दूस हुआ करता था जो नेहायत शरीफ़ और ज़हीन लड़का था जिसकी चर्चा स्कूल भर में खूब हुआ करती थी और एक मैं था जिसे बच्चे हेकारत की नज़रों से देखा करते थे.
हाँ आपने एक कहावत सुनी होगी बन्दा मरता न क्या करता ये कहावत बिलकुल मुझपे फिट बैठति थी उस वक़्त भी और आज भी कभी कभी ये महसूस होता है लेकिन आदत सी होगई है इनसब बातोँ को सुनने की।
इस दोस्ती पे 1 छोटी सी कहानी याद आती है जिसे आपको सुनादेना मुनासिब समझता हूँ ....!
किसी जंगल में 1 हाथी रहता था जिसको दोस्ती करने का बहुत शौक़ था वो बेचारा जंगल से कहीं दूर किसी नदी के किनारे गया वहाँ 1 मेढंक नज़र आया उसे देखके हाथी दिल ही दिल में बहुत खुश हुआ फिर हाथी ने अपने दोस्ती का पैग़ाम मेढंक को पेश किया उसने बड़े घटिया अल्फ़ाज़ में बोला तूने अपने शरीर को देखा है जो मुझसे दोस्ती करने को आटपका में अगर तेरे पाऊं के नीचे चला गया तो मेरा तो क्चम्मर निकल जायेगा,
ये बात सुनतेही हाथी मायूस होके आगे बढ़ा फिर क्या देखता है की 1 लोमड़ी नज़र आई जो नेहायत शरीर और चालाक थी फिर हाथी ने वही बात दोहरायी जो मेढंक से कही थी और फिर क्या था के उसे वहाँ भी मायूसी मिली..
खैर इस दोस्ती को यहीँ रोक के अब्दुल क़ुद्दूस की दोस्ती के बारे मे बताता चलूँ जिसकी दोस्ती इसी से मिलती जुलती है।
अब्द.... को भी बहुत शौक़ था दोस्ती करने का वो भी अपने अरमान को लेकर उस वादी की तरफ़ बढ़ा जहाँ लोग इस दोस्ती को प्यार मुहब्बत से भी ताबीर देते हैं ,अब्दुल कुद्दूस ने वही किया जो हाथी ने क्या था बस फ़रक़ इतना था के हाथी को इब्तदा ही में मायूसी मिली और अब्दुलक़ुद्दूस को कुछ अरसा बाद।
अब्दुलक़ुद्दूस की मेहबूब से शिकायत भरी कहानी कुछ यूं है ........जब वो highschool में था तो उसे भी दोस्ती करने का जूनून सवार हुआ और वो जूनून दिलकी गेहराई से थी उसने एक लड़की के सामने अपनी दोस्ती का पैगाम रखा वो लड़की उसी लोमड़ी की तरह अय्यार और चालाक थी उसने बगैर ताख़ीर किये अब्दुलक़ुद्दूस की दोस्ती को क़ुबूल करली फिर क्या था की ये दोस्ती काफ़ी अरसा तक 1मज़बूत डोर की तरह एक दोसरे से बधि रही ...
बेचारा उस मक्कारी भरी दोस्ती को समझ न स्का और हर वो चीज़ उससे share करता रहा जो शायद उसे नही करनी चाहिये थी लेकिन वो अपनी दोस्ती पे यक़ीन रखता था शायद इसी लिये अपने दिल की हर बात बता देता था और वो लड़की हर उस बात को इस तरह सुनती जैसे 1 मुख्लिस दोस्त सुनता और समझता है।
इसी तरह वक़्त गुज़रता, रहा रातें कटती रही, सवेरा होता रहा, दिन ढलता रहा,, और एकतरफा दोस्ती का बन्धन अपने ऊरुज के ओर तेज़ी से कुँच करतारहा, ऐसी दोस्ती जिसके बारे मे शायद किसी को पता न हो के ये दोनों एक दूसरे केलिये हर वो क़दम उठा सकता है जो नही उठानी चाहिये लेकिन शायद लोगों को ये नही पता था की अब्दुल कुद्दूस की दोस्ती 1 अय्यार लड़की से है जो महज़ अपने मतलब के लिये दोस्ती बनाये रखी है..
हाँ तो मैं ये बताता चलूँ के... ये दोस्ती का चादर दोनों औढ़ के बहुत दूर का सफ़र तै कर चूका था जहाँ से वापिस आना बड़ा ही मुश्किल का काम था। लेकिन ये दोस्ती वक़्त के साथ साथ अपना रुख़ भी बदल रहा था....जैसे बरसात में नदियां रुख़ बदलती है अपने पेट में ज़ियादह पानी भरने की वजह से बस ठीक इसी तरह अब्दुलक़ुद्दूस की अय्यार दोस्त जिसे अब ये मुहब्बत करने लगा था वो भी अपने रुख को ज़ियादह दुलार प्यार पाने की वजह से बदलने लगी, इसलिये किसीने सही कहा है के किसी को इतना न चाहो के वो चाहत तेरी मजबूरी बनजाये सही बात है के ये दोस्ती बड़ी महैंगी पड़ी बेचारा मजनू दोस्त को.....
अब मैं अय्यर लड़की का कारनामा सुनाता चलूँ अय्यार के बदलते रुख को अब्द....देख नही सकता था इसी लिये उसने अपने आपको दूर रहने की कोशिश मे लगगया ताके उस मक्कार की मक्कारी से दूर रहस्के तो अब्द.....ने ignore करना शुरू करदिया अपनी महबूबा को जो किसी ज़माने मे दोस्त थी अब वो काफी आगे आचूका था पढ़ाई भी उसकी 1साल में मुकम्मल होने वाली थी आगे उसका इंट्रेंस भी था किसी चीज़ का इसलिये भी वो और दुरी इख़्तियार करने लगा चूँके पता था के ये तो अपनी शादी रचा के अपने मैके से सुसराल का सफर बख़ुशी तै करलेगी लेकिन मैं यहीं का यहीं रहजाऊंगा इसीलिये
इसी लिये वो सुबह घर से University केलिये निकल जाता और शाम को बन्द कमरे मे खुदको क़ैद करलेता.
इसी तरह वक़्त कटता रहा और प्यार 1 तरफ घटता रहा दूसरी तरफ बढ़ता रहा हाँ इसी दरमियान महबूबा की शादी भी लग्गई बेचारा को जब मालूम हुआ तो अपने मायूस दिल को खुश करने मे लग्गया तभी शादी के date fix होजाने की खबर मिली के February के 1st week मे शादी होने वाली है......
तभी अब्दुलक़ुद्दूस ये शेर पढ़ता हुआ दूसरी दुन्या मे गुम(खोग्या) होगया और आज तक नही नज़र आया..
शेर....
होकर उसी के पास ही क्या बात हो गई
मैं देखता रहा उसे और रात हो गई
पहली नज़र मिली तो हंसे जारहे थे वो
इस तरहे उनसे प्यार की इख़्तताम(end) होगई
Sunday, May 17, 2015
दोस्त रूठ गया
दोस्ती फिर गया रूठ अब क्या करूँ......? 2महीना पहले आगे बढ़ाने वाला हाथ कल दिन के 1बजे कुछ अलट पलट होने की वजह से शोशल नटव्रक के सारी ID से अपने आप को दूर किसी ने मुझे करदिया जिस्से हदसे ज़ियादह दुलार करता हूँ, जिसपे खुदसे ज़ियादह भरोसा क्या और हमेशा करूँगा... जिसकी वजह से किसी कमीनी ज़ात से छुटकारा मिला मुझे.. सबसे पहले रबका शुक्र अदा करता हूँ के उसने शब....को मेरी दोस्ती केलिये भेझा भलेही 2महीना कुछ दिन केलये क्यू ना।।।
उन दिनों जब मैं हदसे ज़ियादह परेशान था के अचानक एक खूबसूरत हाथ दोस्ती केलिये आटपका लेकिन मैं डर भी रहा था के ये ओरों सा तो नही जिस्की वजह से मैं उलझन में पड़ जाता हूँ पर हक़ीक़त तो ये की आज जितना सदमे में हूँ शायद कभी न रहा हूँगा उस्से मुआफ़ी दर महाफि माँगा पर मूम दिल आज ना पिघल स्का भला पिघलता भी क्यू.....? मेने उसके दिल को ठेस जो पहुँचाया है।
हाँ आज ही उस गलती को accept करता हुँ के में बहुत बड़ी बात कहदी जो मुझे नही कहनी चाहिये , बस जज़्बाती हूँ जब किसी उलझन में होता हूँ तो किसी से कुछ भी कह देता बाद में अफ़सोस करता हूँ लेकिन काफी देर होजाता है तबतक किसी का दिल चाक होचुका होता है बाद में माफ़ी मांगता हूँ जो नही मिलती मुझे, इस्से और गम में पर जाता और तबीयत ख़राब होजाती और मैं उस गम की वजह तहक़ीक़ नही करपाता मैं।
ख़ैर उसकी पियारी बातें हमे ज़रूर सतायेगी क्यू के उस्से सिर्फ और सिर्फ मेरी बातें शोशल मीडिया पे हुती रही है और बस चन्द मिंट आमने सामने हुई वो भी 1घण्टा 15मिंट इन्तज़ार करने के बाद जब वो examदे के अपने पुराने दोस्तों के साथ जारहे थे न तो सहिसे देख स्का और नही बात करस्का खैर मेरी किस्मत ही ऐसी है दोस्त सिर्फ चन्द दिनों ही केलिए मिलते हैं और फिर किसी बात पे रूठ के कहीं दूर चले जाते मुझे छोड़ के.......पर उम्मीद अबभी लगी रहती है।
हाँ :--इसी वजह से किसी से जल्दी दोस्ती करता नही मैं और दोस्ती करने से पहले ही बतदेता हूँ के मेरी दोस्ती किसी को रास नही आती है...हाँ मैं आप को भी बता दिया था, और जिसने कल मुझसे रूठ के अपने खूबसूरत रुख़ को मुझसे मूड लिया उसे भी बड़े ताकीद से बोला था के आप भी न अपने बढ़ाये क़दम को रुक न लेना,,, पर उसने ऐसा भरोसा दिलाया के मैं ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गया और उस दोस्ती को दिलकश अंदाज़ में क़ुबूल करलिया .. जिसे कल आंसू के साथ बिदा करना पर रहा था जो मुझसे कभी नही होसकता।। इस मोके पर 1शेर यद आता है।।।।
ज़मीं पे फूल गिरता है उठाता है कोई कोई
दोस्ती सभी से होती है निभाता है कोई कोई।
गुलाब का फूल तोड़ा नही जाता
खुद से दोस्ती छोड़ा नही जाता।
हाय अफ़सोस के ऐसी गलती न होती मुझसे जो इस मोड़ पे खड़ा दोस्ती का गला घोटता हुआ अपने आँखों से देखने पे मजबूर होरहा हूँ, खैर मैं भी खुदा ही का बनदा हूँ मुझसे भी गलती होसकती है अगर खुदा अपने बन्दों की गलती माफ़ करसकता है तो फिर बन्दा बन्दा को क्यू नही माफ़ करसकता है मुझे अपने दोस्त पे चढ़ती सूरज की तरह यक़ीन है के माफ़ी के साथ चाहे जो सज़ा दे पर फिरसे अपनी दोस्ती को वही मुक़ाम पे ला खड़ा करदे.
अब मैं आखिर में अपने हरदिल अज़ीज़ दोस्त से request करता हूँ की हमने जो गलती की है उसका बदल जिस रूप में लेले पर दोस्ती तोड़के न ले उसे अपनी जगह पे बाकी रखें और शाना बशाना फिर से हो जाये हमदोनों।
और मैं अपने रब से भी दुआ करता हूँ की ऐ हमारे रब हमे फिरसे वो gift अता करदे जो किसी बड़ी गलती की वजह से 2रोज़ से रुख़ अपना मोड़े हुये है ऐ हमारे रब मेरी उस गलती के बदले इस क़ीमती गिफ्ट को न रूठने दे पिलिज़ फिरसे अता करदे और उनके दिल को मूम बना दे फिरसे और जोड़ दे मुझसे..... आमीन.
Friday, May 1, 2015
FAREWELL
अलविदा ऐ साथियों अलविदा अहले चमन।
खुश नुमा महबूब दिलकश है हमारा फेयरवेल।
है सभी उस्ताद मुश्फिक फख्र की ये बात है।
क्या चमक और क्या दमक कैसी हसीं ये शाम है।
ज़र्रा ज़र्रा शाद है तिफ़ले L U में लग्न।
अलविदा ऐ साथियों अलविदा अहले चमन।
साथ रहकर तेरे मुझसे हो गई हो गर ख़ता।
सामने हाज़िर हूँ तेरे बेखता हूँ गर बता।
आज ही तू ले ले बदला पेश है मेरा बदन।
अलविदा ऐ साथियों अलविदा अहले चमन।
बाग बां मौजूद है बाग जो मुरझा गया।
रंज है मुझको यकीनन आखिरी दिन आ गया।
एक तरफ खुशियों का राज एक तरफ रंज की किरण।
अलविदा ऐ साथियों अलविदा अहले चमन।
खुश नुमा महबूब दिल कश है हमारा farewell.
बटके हम सब टोलियों में काम को अपने चले।
हम जो रह रह कर भी यारों याद तमको आएंगे।
जा रहे हो दोस्तों !...फिर कभी होगी मिलन।
Monday, April 13, 2015
रात..........?
घूमता टहलता जब शाम को घर पहुँचा तो मेरी नज़र सामने की दिवार पर पड़ी उसपे कुछ अल्फ़ाज़ अलग ज़ुबां में लिखा था जिसे देखते ही मेरी नज़र उसपे टिकी की टिकी रह गई, जैसे present time में बच्चों की निगाहें chocolate पे पड़ते ही अड़ जाती है, बीएस ठीक इसी तरह समझ लीजये......
फिर अचानक एक आवाज़ सुनाई दी जो जनि पहचानी सी लगरही थी देखते ही देखते सामने एक नन्हा सा पियारा सा तिफ़्ल अपने लड़खड़ा ते क़दमो से चलता हुआ मेरे ही ओर आरहा था और वो कुछ टोटी फूटी ज़ुबान में मुझसे कुछ कहना भी चाह रहा था जिसे समझ पाना बड़ा मुश्किल का काम था मेरे लिये हाँ जब मेने देखा की वो मेरे ही तरफ अपनी लड़खड़ाती क़दमों को बढ़ा रहा है तो मैं भी मुस्कुराते हुए अपने क़दमों को तिफ़्ल के ओर लेजाने पर मजबूर क्या क़रीब ही था के मैं उसे गले लगाता अचानक वो ज़मीन पे गिरा और उसकी सांसे रुक्गयी और मैं उससे कुछ पूछ भी ना स्का और कुछ समझ भी ना स्का फिर मेरे दिल में एक सवाल उभरने लगा..... फिर क्या था की में खुद से सवाल पूछने लगा के आखिर ये नन्हा तिफ़्ल मुझसे क्या कहना चाहरहा था और वो कह न स्का और वो अल्लाह को पियारा हो गया.
हाँ कुछ देर मैं वहाँ रुक रहा और फिर उस ओर चला जहाँ दिवार पे कुछ अल्फ़ाज़ लिखा था के शायद उससे कुछ पता चले....
जबतक आसमां पर काली घटा छाचुकी थी पर मेरा दिल तो उस नन्हा तिफ़ल पे अटका था फिरभी में अपने दिल पे पथ्थर रख के अपने क़दमों को उस गेट के सामने वाले दिवार के पास लेजाने पे मजबूर किया महज़ इसलिए के मुझे नन्हे तिफ़्ल की बात समझ आजाये लेकिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो ना तो बिजली थी और न कोई ऐसी रौशनी जिसकी मदद से मैं उस दिवार पे लिखा अल्फ़ाज़ पढ़ और समझ सकूँ जिस्से कुछ पता लगे.
खैर रात तारीकी को अपनाते हुए दिन के सूरज का मुन्तज़िर था मैं भी उसपे लिखे अल्फ़ाज़ देखने केलिए बेताब था के कब तारीकी छट जाये और नन्हे तिफ़्ल के सवाल का जवाब मिल जाये मुझे जिस्से दिलको सकून हासिल हो और नन्हे तिफ़्ल केलिए कुछ कारे खैर कर जाऊँ.
खैर देर रात हो गई और मेरी आँखों को नींद परेशान करने लगी और मैं कब ख्वाब में डूबा पताही ना चला, सुबह जब नींद खुली तो काफ़ी भीड़ इखठठा देखा ऐसा लगने लगा जैसे रात को मेने कुछ देखा ही नही फिर याद आया की किसी चीज़ की तलाश थी मुझे फिर दिमाग़ पे ज़ोर दिया फिर ख्याल आया की तिफ़्ल ने मरते वक़्त कुछ इशारा करग्या था जिसका में मुतलाशि हूँ.
खैर घर के कुछ फर्द तिफ़्ल के जनाज़ह के इंतज़ाम में लगे हुए थे और उस सवाल के क़रीब आ पहुंचा था,
वो तिफ़्ल के तुतलाहट भरी ज़ुबान से जो अल्फ़ाज़ मरते दम निकला था उसका जवाब उस दिवार पे तो नही था....
लेकिन उनकी माँ से पता चला की ग़ज़ाली मुझे तो छोड़ के गया पर वो एक इशारा करदिया के अम्मा जान मैं तो रब के पास जारहा हूँ लेकिन बॉबी और स्वीटी को अछी फ़िज़ा से आशना कराना और उसको अछी से अछि तालीम देना और एक खूबरु साँचे में ढाल देना ताके तेरे बूढा पे की लाठी बन सके।
अगर तुम ना होते
में अपने मज़्मून का आग़ाज़ अपने शेर से करता चलूँ।।।
अगर तुम न होते ज़माना में कोई रंग न होता।
मैं न होता तुम न होते ये जहाँ न होता।
ये फूल न होता ये खुशबु न होती।
ये चाँद तारे आसमाँ न होता।
कहते हैं लोग एकदूसरे के बग़ैर जी नही सकता मुमकिन है के कोई ऐसा भी बंदये ख़ुदा इस काईंनत में कहीं न कहीं किसी गोशा में छिपा ठंडी साँसे लेरहा हो।
हाँ एक हबीब अपने मेहबूब को एक जंगल में तहे दिल से याद करता रहता पर उसे आज तक उस महबूब् का दीदार न हो स्का और आज भी वे अपने मेहबूब को उसी जंगल के एक गोशा में याद करता रहता के कभी न कभी उसकी दीदार ज़रूर होगी इस उम्मीद के साथ के उसका मेहबूब अचानक जलवा अफरूज़ होगा और उस के दीदार के साथ ही उसकी रूह ख़ुदा वंदे कुद्दूस के पास जा पहुंचेगी।
Wednesday, April 8, 2015
कफ़न
आज मेरे मज़्मून में तन के उस कपड़े का ज़िकर होगा जो हर आदम के औलाद को इस रोये ज़मीन से कूंच करते वक़्त पेहेनना होता है चाहे वो जिस मज़हब का हो मर्द औरत बच्चे बुड्ढे जो हो सब को इस कपड़े की ज़रूरत लाज़िम आता है,
मेने इस कपड़े को मौज़ेए बहस इसलिए बना या की ये एक इंसान केलिए ऐसा कपड़ा है जिसे हर कोई को कभी न कभी पहनना है सिवाए शहीदों के बता दूँ के जो शख्श खुदा के राह में या वतन के खातिर अपनी जान की क़ुरबानी देता है तो इस्लाम में उस केलिए उसी कपड़े में दो गज़ ज़मीन के तल जनाजह के नमाज़ के बाद दफन करदेने का हुकुम है लेकिन गैर इस्लाम में भी वतन के खातिर क़ुर्बान होने वाले शख़्स को उसी कपडे में चाहे तो जला दिया जाता है चाहे उसे उसके अक़ीदे के मुताबिक़ दफनादिया जा ता है।
ये कपड़ा तक़रीबन हर मज़हब में सफ़ेद रंग का होता है जिसे हम कफ़न के नाम से जानते हैं, हाँ ये वही कफ़न है जो हर शख़्स को मरने के बाद नसीब होता है जिसका size तक़रीबन 2 गज़ होता है, फिर उसे कंधे के सहारे क़ब्रिस्तान लेजाया जाता है और फिर ( मिन्हा ख़ल्कना कुम व फीहा नुईदुकूम व मिन्हा नुख्रिजुकुम तारत्न उखरा ) कहते हुए ज़मीन में दफन करदेते हैं। ये जो brecket में लिखा हे ये क़ुरआन का एक टुकड़ा है, हाँ हिन्दू मज़हब में राम राम सततय कहते हुए श्मशान लेजाते हैं और वहाँ मुर्दे को जला कर राख को गंगा या किसी नदी में बहा देते हैं ता के उसके रूह को सुकून पहुंचे।
हाँ इस कपड़े की हक़ीक़त भी जान्ना हमारे लये ख़ासा ज़रूरी है इतना तो ज़रूर हम जानते है की ये एक सफ़ेद कपड़ा होता है जीसे मय्यत को उढ़ा कर जला दिया जाता है या दफ़ना दया जाता है ..... लेकिन ऐसा क्यू क्या जाता है ये तो हमे भी नही पता लेकिन इतना तो हमे मालूम है की बरसो से ये रवायत चलती आरही है जिसको हम अपने अक़ीदे के हिसाब से अपने अम्ल में रख लिए हैं।
एक बात दफन कफ़न के सिलसिले से ज़रूर गोष गुज़ार करदेना चाहता हूँ के कफ़न दफन का मोजिद कोन है(ईजाद करने वाला) तो आपको बताता चलूँ के बाबा आदम के दो बीते थे उन दोनों को किसी बात पे बहसा बेसी हुई और एक ने ये फैसला करलिया की दोसरे को मार देना है और ऐसा ही हुआ जब क़ाबिल ने हाबिल को मार दिया तो अब सोचने लगा और इस फ़िक्र में पड़ग्या की इस मुर्दे का क्या करूँ तो अचानक आसमान से 2 कौवा (crow ) लड़ते हुए आरहा था तभी एक गिरा जैसे ही गिरा दोसर वाला crow आया और अपने चोंच से ज़मीन खुदा और उस crow को मिटटी के तल दबो दिया यही से कफ़न दफन का तरीक़ा शुरू हुआ इस्लाम में हाँ ये जो क़त्ल था ज़मीन पे सबसे पहला क़त्ल था।
हाँ ये तो बताना भूल ही गया सफ़ेद कपड़ा अरब मुमालिक में शादी का जोड़ा होता है और ईसाई मज़हब में भी शादी के मुके पे सफ़ेद रंग के कपड़े में लड़कियां मइके से ससुराल कूंच करती है और कहीं कहीं जब बच्चा पैदा होता है तो उसे भी सफ़ेद कपड़े पहनाते हैं।।
तो ये है कफ़न कभी ख़ुशी कभी गम
इस हवाले से एक शेर कह कर अपने मज़्मून(essay ) को आख़री कगार पर ला खड़ा करता हूँ।
शेर..........
दुन्या गाड़ी का जक्शन है कोई आये कोई जाये
जीवन में कुछ और नही बस Tata Bye Bye
मेने इस कपड़े को मौज़ेए बहस इसलिए बना या की ये एक इंसान केलिए ऐसा कपड़ा है जिसे हर कोई को कभी न कभी पहनना है सिवाए शहीदों के बता दूँ के जो शख्श खुदा के राह में या वतन के खातिर अपनी जान की क़ुरबानी देता है तो इस्लाम में उस केलिए उसी कपड़े में दो गज़ ज़मीन के तल जनाजह के नमाज़ के बाद दफन करदेने का हुकुम है लेकिन गैर इस्लाम में भी वतन के खातिर क़ुर्बान होने वाले शख़्स को उसी कपडे में चाहे तो जला दिया जाता है चाहे उसे उसके अक़ीदे के मुताबिक़ दफनादिया जा ता है।
ये कपड़ा तक़रीबन हर मज़हब में सफ़ेद रंग का होता है जिसे हम कफ़न के नाम से जानते हैं, हाँ ये वही कफ़न है जो हर शख़्स को मरने के बाद नसीब होता है जिसका size तक़रीबन 2 गज़ होता है, फिर उसे कंधे के सहारे क़ब्रिस्तान लेजाया जाता है और फिर ( मिन्हा ख़ल्कना कुम व फीहा नुईदुकूम व मिन्हा नुख्रिजुकुम तारत्न उखरा ) कहते हुए ज़मीन में दफन करदेते हैं। ये जो brecket में लिखा हे ये क़ुरआन का एक टुकड़ा है, हाँ हिन्दू मज़हब में राम राम सततय कहते हुए श्मशान लेजाते हैं और वहाँ मुर्दे को जला कर राख को गंगा या किसी नदी में बहा देते हैं ता के उसके रूह को सुकून पहुंचे।
हाँ इस कपड़े की हक़ीक़त भी जान्ना हमारे लये ख़ासा ज़रूरी है इतना तो ज़रूर हम जानते है की ये एक सफ़ेद कपड़ा होता है जीसे मय्यत को उढ़ा कर जला दिया जाता है या दफ़ना दया जाता है ..... लेकिन ऐसा क्यू क्या जाता है ये तो हमे भी नही पता लेकिन इतना तो हमे मालूम है की बरसो से ये रवायत चलती आरही है जिसको हम अपने अक़ीदे के हिसाब से अपने अम्ल में रख लिए हैं।
एक बात दफन कफ़न के सिलसिले से ज़रूर गोष गुज़ार करदेना चाहता हूँ के कफ़न दफन का मोजिद कोन है(ईजाद करने वाला) तो आपको बताता चलूँ के बाबा आदम के दो बीते थे उन दोनों को किसी बात पे बहसा बेसी हुई और एक ने ये फैसला करलिया की दोसरे को मार देना है और ऐसा ही हुआ जब क़ाबिल ने हाबिल को मार दिया तो अब सोचने लगा और इस फ़िक्र में पड़ग्या की इस मुर्दे का क्या करूँ तो अचानक आसमान से 2 कौवा (crow ) लड़ते हुए आरहा था तभी एक गिरा जैसे ही गिरा दोसर वाला crow आया और अपने चोंच से ज़मीन खुदा और उस crow को मिटटी के तल दबो दिया यही से कफ़न दफन का तरीक़ा शुरू हुआ इस्लाम में हाँ ये जो क़त्ल था ज़मीन पे सबसे पहला क़त्ल था।
हाँ ये तो बताना भूल ही गया सफ़ेद कपड़ा अरब मुमालिक में शादी का जोड़ा होता है और ईसाई मज़हब में भी शादी के मुके पे सफ़ेद रंग के कपड़े में लड़कियां मइके से ससुराल कूंच करती है और कहीं कहीं जब बच्चा पैदा होता है तो उसे भी सफ़ेद कपड़े पहनाते हैं।।
तो ये है कफ़न कभी ख़ुशी कभी गम
इस हवाले से एक शेर कह कर अपने मज़्मून(essay ) को आख़री कगार पर ला खड़ा करता हूँ।
शेर..........
दुन्या गाड़ी का जक्शन है कोई आये कोई जाये
जीवन में कुछ और नही बस Tata Bye Bye
Tuesday, April 7, 2015
कफ़न
आया हूँ इस जहाँ में बस उम्मीदों के सहारे
खुशयाँ न दे सकूँ गर उम्मीदों के सहारे
पल भर की ये ज़िंदग्गी है करना हे क्या हमें
बस हस्ते हुए काटलेना हे उम्मीदों के सहारे
वो जो आकाये हर ज़माना हे भेजा हे हमे
क्या करना हे बताया हे उम्मीदों के सहारे
ये मतलब भरा दुन्या हे इससे क्या लेना हे देना
दो गज़ ज़मी के अंदर जाना हे उम्मीदों के सहारे
जब आएगा बुलावा रब्बे के पास से जाना ही पड़ेगा
लिपटे हुए कफ़न में ..जाना पड़ेगा कंधो के सहारे
ज़करिया ये ज़िन्दगी हे तेरी किस के सहारे........?
है ज़िन्दगी मेरी उम्मीदों के सहारे बस रब के सहारे।
खुशयाँ न दे सकूँ गर उम्मीदों के सहारे
पल भर की ये ज़िंदग्गी है करना हे क्या हमें
बस हस्ते हुए काटलेना हे उम्मीदों के सहारे
वो जो आकाये हर ज़माना हे भेजा हे हमे
क्या करना हे बताया हे उम्मीदों के सहारे
ये मतलब भरा दुन्या हे इससे क्या लेना हे देना
दो गज़ ज़मी के अंदर जाना हे उम्मीदों के सहारे
जब आएगा बुलावा रब्बे के पास से जाना ही पड़ेगा
लिपटे हुए कफ़न में ..जाना पड़ेगा कंधो के सहारे
ज़करिया ये ज़िन्दगी हे तेरी किस के सहारे........?
है ज़िन्दगी मेरी उम्मीदों के सहारे बस रब के सहारे।
Sunday, February 22, 2015
NA UMMEED
सदयूं घूमता झूमता रहा मैं
हर दम तेरा इंतज़ार करता रहा मैं
तुझसे मुद्द्त हुये यारा मिले
तेरे दिल में नही वो जो दिल में मेरे
पता होता जो ये हादसा होगा आज
तो क़ुर्बत हासिल न करता मैं कल
चलो अच्छा हुआ जो होना था होगया
अबतो तेरे दिल को सुकूंन तो मिलगया
ज़करिया ऐसी उम्मीदें लगाता क्यू?
ऐसी दुन्याँ से उम्मीद रखता है क्यू?
हर दम तेरा इंतज़ार करता रहा मैं
तुझसे मुद्द्त हुये यारा मिले
तेरे दिल में नही वो जो दिल में मेरे
पता होता जो ये हादसा होगा आज
तो क़ुर्बत हासिल न करता मैं कल
चलो अच्छा हुआ जो होना था होगया
अबतो तेरे दिल को सुकूंन तो मिलगया
ज़करिया ऐसी उम्मीदें लगाता क्यू?
ऐसी दुन्याँ से उम्मीद रखता है क्यू?
Friday, February 20, 2015
HUM OR NETA JI
दौरे हाज़िर को ये देखते हुए महसूस होता है की बाग़ में फूल तो हज़ार हा हज़ार क़िस्म के हैं लेकिन खुशबु किसी में नही पेड़ में फ़ल भरा पड़ा हैं लेकिन ज़ायक़ा किसी में नहीं, बस ठीक इसी तरह हमारे मुल्क की सियासत का हाल है, नेता जी तो क़िस्म क़िस्म के हैं लेकिन देश की भलाई केलिए नहीं सिर्फ अपनी कुर्सी केलिए और अपने इज़्ज़त व मर्तबा केलिए न के देश के जनता की भलाई केलिए,
हाँ अगर नेता जी चाहे तो जिस तरह हमसब की मदद से ये कुर्सी संभालते है ठीक इसी तरह वो अपनी तवज्जह से इस सर ज़मीन को फिरसे हरा भरा करसकते हैं लेकिन शर्त है की नेता जी चाहलें,
ये पढ़ते हुए भले ही आपको अजीब सा महसूस होरहा होगा लेकिन हक़ीक़त यही है की फिर से हम अपने मुल्क को अपने इल्म व हुनर और लग्न के ज़रिये एक अच्छे रहनुमा के ज़ेरे सरपरस्त अपने मुल्क को सँवारने में एक सर (HEAD) होकर जुट जाये तभी हमारा देश सोने की चिड़या बनके उभरेगी वरना फिर वही मिटटी का पुतला बना का बना रह्जायेगा,
हाँ हम ये बखूबी जानते हैं की कोई भी चीज़ बगैर स्पोर्ट के थम नही सकती ठीक इसी तरह हम अपने मुल्क को फिर से सोने का चिड़या देखना चाहते है तो हमसबको एक ऐसे नेता जी को चुनना होगा जो हमसबका खैर खः हो और हमारी ज़रूरत्तों को समझने वाला हो और हमारे मुल्क की खातिर अपनी जान भी क़ुर्बान करदे ज़रूरत पर्ने पर, लेकिन इस केलिए शर्त है की हमभी नेता जी के शाना ब्शना खड़े रहें तभी ये कुछ अच्छा कर पाएंगे नही तो ये लड़खड़ा के गिर पड़ेंगे और सारा काम वहीं का वहीं रुका रेहजायेगा।।।।।।।।।
हाँ अगर नेता जी चाहे तो जिस तरह हमसब की मदद से ये कुर्सी संभालते है ठीक इसी तरह वो अपनी तवज्जह से इस सर ज़मीन को फिरसे हरा भरा करसकते हैं लेकिन शर्त है की नेता जी चाहलें,
ये पढ़ते हुए भले ही आपको अजीब सा महसूस होरहा होगा लेकिन हक़ीक़त यही है की फिर से हम अपने मुल्क को अपने इल्म व हुनर और लग्न के ज़रिये एक अच्छे रहनुमा के ज़ेरे सरपरस्त अपने मुल्क को सँवारने में एक सर (HEAD) होकर जुट जाये तभी हमारा देश सोने की चिड़या बनके उभरेगी वरना फिर वही मिटटी का पुतला बना का बना रह्जायेगा,
हाँ हम ये बखूबी जानते हैं की कोई भी चीज़ बगैर स्पोर्ट के थम नही सकती ठीक इसी तरह हम अपने मुल्क को फिर से सोने का चिड़या देखना चाहते है तो हमसबको एक ऐसे नेता जी को चुनना होगा जो हमसबका खैर खः हो और हमारी ज़रूरत्तों को समझने वाला हो और हमारे मुल्क की खातिर अपनी जान भी क़ुर्बान करदे ज़रूरत पर्ने पर, लेकिन इस केलिए शर्त है की हमभी नेता जी के शाना ब्शना खड़े रहें तभी ये कुछ अच्छा कर पाएंगे नही तो ये लड़खड़ा के गिर पड़ेंगे और सारा काम वहीं का वहीं रुका रेहजायेगा।।।।।।।।।
Friday, February 6, 2015
जुनूं का मंज़र
जुनूं का परचम लहराउंगा मैं सुनाउंगा मैं
है क्या चीज़ जुनूं बताऊंगा मैं सुनाऊंगा मैं
जो ज़िद है क्या मुझसे तूने बताऊंगा मैं
ख़ुदा गवाह है जो ज़ुल्म किया है मुझपे
है दिल ने तोड़ा किसीका तूने दिखाऊंगा मैं
किया है जो तूने इसके साथ जहाँसे बताऊंगा मैं
देखलेना सुन भी लेना बता भी देना उससे
क्या है कहता सुना भी बता भी देना मुझसे?
है एक इल्तिजा तुझसे ऐ दिल रूबा
किसी और के साथ भी न ऐसा करना
ज़करिया कैसी उम्मीदें लगाएं है बेठा उस्से
ये तो उम्मीदों की धज्जियाँ उड़ा ती है हरदम।
M Z FARMANI
Wednesday, January 21, 2015
FAREB HI FAREB
ख़ुशी मिलगई किया के हँसी रुकगई,
अपनों से करीब कीया दूर होगये,
ऐसा सुना था किसी से के हो दिल में तुम,
जब झाका जो दिल मे तो पाया फरेब ही फ़रेब।
Wednesday, January 14, 2015
Mtlabonn ka yaar
Hme bhi mtlabonn ka yaar banna pdega ek din
Chaand nii sooraj banna pdega ek din,
Mn to bhr gya h is jahann se lekin
Kya haqeeqt h pta chlega ek din,
Zakariya sunle ek khbar h tere lye us jahnn me
Jake mil lo us jahann wolonn se ek din.
M.Z.farmani.
Chaand nii sooraj banna pdega ek din,
Mn to bhr gya h is jahann se lekin
Kya haqeeqt h pta chlega ek din,
Zakariya sunle ek khbar h tere lye us jahnn me
Jake mil lo us jahann wolonn se ek din.
M.Z.farmani.
Monday, January 12, 2015
Mitti K Sanam
Q kya huaa..! Dil bhar gya Mitti k Sanam se,
Achha huaa mtlab nikl gya Mitti k Sanam s,
Jo hogya so hogya ab kya krna h ye bta,
Tera b kaam nikla mera b kaam nkla,
Ab kya socha h ye bta Mitti k Sanam se,
Aage rkhunn ya band krdonn ye Dosti yari,
Faisla tere haath me h bta kya kronn Mitti k sanm..?
ise khodonn Zakariya ya failadonn jahann me.
From:- M.Z. Farmani.
Achha huaa mtlab nikl gya Mitti k Sanam s,
Jo hogya so hogya ab kya krna h ye bta,
Tera b kaam nikla mera b kaam nkla,
Ab kya socha h ye bta Mitti k Sanam se,
Aage rkhunn ya band krdonn ye Dosti yari,
Faisla tere haath me h bta kya kronn Mitti k sanm..?
ise khodonn Zakariya ya failadonn jahann me.
Wednesday, January 7, 2015
Sunday, January 4, 2015
Subscribe to:
Comments (Atom)





