घूमता टहलता जब शाम को घर पहुँचा तो मेरी नज़र सामने की दिवार पर पड़ी उसपे कुछ अल्फ़ाज़ अलग ज़ुबां में लिखा था जिसे देखते ही मेरी नज़र उसपे टिकी की टिकी रह गई, जैसे present time में बच्चों की निगाहें chocolate पे पड़ते ही अड़ जाती है, बीएस ठीक इसी तरह समझ लीजये......
फिर अचानक एक आवाज़ सुनाई दी जो जनि पहचानी सी लगरही थी देखते ही देखते सामने एक नन्हा सा पियारा सा तिफ़्ल अपने लड़खड़ा ते क़दमो से चलता हुआ मेरे ही ओर आरहा था और वो कुछ टोटी फूटी ज़ुबान में मुझसे कुछ कहना भी चाह रहा था जिसे समझ पाना बड़ा मुश्किल का काम था मेरे लिये हाँ जब मेने देखा की वो मेरे ही तरफ अपनी लड़खड़ाती क़दमों को बढ़ा रहा है तो मैं भी मुस्कुराते हुए अपने क़दमों को तिफ़्ल के ओर लेजाने पर मजबूर क्या क़रीब ही था के मैं उसे गले लगाता अचानक वो ज़मीन पे गिरा और उसकी सांसे रुक्गयी और मैं उससे कुछ पूछ भी ना स्का और कुछ समझ भी ना स्का फिर मेरे दिल में एक सवाल उभरने लगा..... फिर क्या था की में खुद से सवाल पूछने लगा के आखिर ये नन्हा तिफ़्ल मुझसे क्या कहना चाहरहा था और वो कह न स्का और वो अल्लाह को पियारा हो गया.
हाँ कुछ देर मैं वहाँ रुक रहा और फिर उस ओर चला जहाँ दिवार पे कुछ अल्फ़ाज़ लिखा था के शायद उससे कुछ पता चले....
जबतक आसमां पर काली घटा छाचुकी थी पर मेरा दिल तो उस नन्हा तिफ़ल पे अटका था फिरभी में अपने दिल पे पथ्थर रख के अपने क़दमों को उस गेट के सामने वाले दिवार के पास लेजाने पे मजबूर किया महज़ इसलिए के मुझे नन्हे तिफ़्ल की बात समझ आजाये लेकिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो ना तो बिजली थी और न कोई ऐसी रौशनी जिसकी मदद से मैं उस दिवार पे लिखा अल्फ़ाज़ पढ़ और समझ सकूँ जिस्से कुछ पता लगे.
खैर रात तारीकी को अपनाते हुए दिन के सूरज का मुन्तज़िर था मैं भी उसपे लिखे अल्फ़ाज़ देखने केलिए बेताब था के कब तारीकी छट जाये और नन्हे तिफ़्ल के सवाल का जवाब मिल जाये मुझे जिस्से दिलको सकून हासिल हो और नन्हे तिफ़्ल केलिए कुछ कारे खैर कर जाऊँ.
खैर देर रात हो गई और मेरी आँखों को नींद परेशान करने लगी और मैं कब ख्वाब में डूबा पताही ना चला, सुबह जब नींद खुली तो काफ़ी भीड़ इखठठा देखा ऐसा लगने लगा जैसे रात को मेने कुछ देखा ही नही फिर याद आया की किसी चीज़ की तलाश थी मुझे फिर दिमाग़ पे ज़ोर दिया फिर ख्याल आया की तिफ़्ल ने मरते वक़्त कुछ इशारा करग्या था जिसका में मुतलाशि हूँ.
खैर घर के कुछ फर्द तिफ़्ल के जनाज़ह के इंतज़ाम में लगे हुए थे और उस सवाल के क़रीब आ पहुंचा था,
वो तिफ़्ल के तुतलाहट भरी ज़ुबान से जो अल्फ़ाज़ मरते दम निकला था उसका जवाब उस दिवार पे तो नही था....
लेकिन उनकी माँ से पता चला की ग़ज़ाली मुझे तो छोड़ के गया पर वो एक इशारा करदिया के अम्मा जान मैं तो रब के पास जारहा हूँ लेकिन बॉबी और स्वीटी को अछी फ़िज़ा से आशना कराना और उसको अछी से अछि तालीम देना और एक खूबरु साँचे में ढाल देना ताके तेरे बूढा पे की लाठी बन सके।
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