Monday, April 13, 2015

अगर तुम ना होते

में अपने मज़्मून का आग़ाज़ अपने शेर से करता चलूँ।।।
अगर तुम न होते ज़माना में कोई रंग न होता।
मैं न होता तुम न होते ये जहाँ न होता।
ये फूल न होता ये खुशबु न होती।
ये चाँद तारे आसमाँ न होता।

कहते हैं लोग एकदूसरे के बग़ैर जी नही सकता मुमकिन है के कोई ऐसा भी बंदये ख़ुदा इस काईंनत में कहीं न कहीं किसी गोशा में छिपा ठंडी साँसे लेरहा हो।

हाँ एक हबीब अपने मेहबूब को एक जंगल में तहे दिल से याद करता रहता पर उसे आज तक उस महबूब् का दीदार न हो स्का और आज भी वे अपने मेहबूब को उसी जंगल के एक गोशा में याद करता रहता के कभी न कभी उसकी दीदार ज़रूर होगी इस उम्मीद के साथ के उसका मेहबूब अचानक जलवा अफरूज़ होगा और उस के दीदार के साथ ही उसकी रूह ख़ुदा वंदे कुद्दूस के पास जा पहुंचेगी।

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