Monday, April 13, 2015

रात..........?


      घूमता टहलता जब शाम को घर पहुँचा तो मेरी नज़र सामने की दिवार पर पड़ी उसपे कुछ अल्फ़ाज़ अलग ज़ुबां में लिखा था जिसे देखते ही मेरी नज़र उसपे टिकी की टिकी रह गई, जैसे present time में बच्चों की निगाहें  chocolate पे पड़ते ही अड़ जाती है, बीएस ठीक  इसी तरह समझ लीजये......
 
      फिर अचानक एक आवाज़ सुनाई दी जो जनि पहचानी सी लगरही थी देखते ही देखते सामने एक नन्हा सा पियारा सा तिफ़्ल अपने लड़खड़ा ते क़दमो से चलता हुआ मेरे ही ओर आरहा था और वो कुछ टोटी फूटी ज़ुबान में मुझसे कुछ कहना भी चाह रहा था जिसे समझ पाना बड़ा मुश्किल का काम था मेरे लिये हाँ जब मेने देखा की वो मेरे ही तरफ अपनी लड़खड़ाती क़दमों को बढ़ा रहा है तो मैं भी मुस्कुराते हुए अपने क़दमों को तिफ़्ल के ओर लेजाने पर मजबूर क्या क़रीब ही था के मैं उसे गले लगाता अचानक वो ज़मीन पे गिरा और उसकी सांसे रुक्गयी और मैं उससे कुछ पूछ भी ना स्का और कुछ समझ भी ना स्का फिर मेरे दिल में एक सवाल उभरने लगा..... फिर क्या था की में खुद से सवाल पूछने लगा के आखिर ये नन्हा तिफ़्ल मुझसे क्या कहना चाहरहा था और वो कह न स्का और वो अल्लाह को पियारा हो गया.

      हाँ कुछ देर मैं वहाँ रुक रहा और फिर उस ओर चला जहाँ दिवार पे कुछ अल्फ़ाज़ लिखा था के शायद उससे कुछ पता चले....
जबतक आसमां पर काली घटा छाचुकी थी पर मेरा दिल तो उस नन्हा तिफ़ल पे अटका था फिरभी में अपने दिल पे पथ्थर रख के अपने क़दमों को उस गेट के सामने वाले दिवार के पास लेजाने पे मजबूर किया महज़ इसलिए के मुझे नन्हे तिफ़्ल की बात समझ आजाये लेकिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो ना तो बिजली थी और न कोई ऐसी रौशनी जिसकी मदद से मैं उस दिवार पे लिखा अल्फ़ाज़ पढ़ और समझ सकूँ जिस्से कुछ पता लगे.

      खैर रात तारीकी को अपनाते हुए दिन के सूरज का मुन्तज़िर था मैं भी उसपे लिखे अल्फ़ाज़ देखने केलिए बेताब था के कब तारीकी छट जाये और नन्हे तिफ़्ल के सवाल का जवाब मिल जाये मुझे जिस्से दिलको सकून हासिल हो और नन्हे तिफ़्ल केलिए कुछ कारे खैर कर जाऊँ.

      खैर देर रात हो गई और मेरी आँखों को नींद परेशान करने लगी और मैं कब ख्वाब में डूबा पताही ना चला, सुबह जब नींद खुली तो काफ़ी भीड़ इखठठा देखा ऐसा लगने लगा जैसे रात को मेने कुछ देखा ही नही फिर याद आया की किसी चीज़ की तलाश थी मुझे  फिर दिमाग़ पे ज़ोर दिया फिर ख्याल आया की तिफ़्ल ने मरते वक़्त कुछ इशारा करग्या था जिसका में मुतलाशि हूँ.

       खैर घर के कुछ फर्द तिफ़्ल के जनाज़ह के इंतज़ाम में लगे हुए थे और उस सवाल के क़रीब आ पहुंचा था,

      वो तिफ़्ल के तुतलाहट भरी ज़ुबान से जो अल्फ़ाज़ मरते दम निकला था उसका जवाब उस दिवार पे तो नही था....
लेकिन उनकी माँ से पता चला की ग़ज़ाली मुझे तो छोड़ के  गया पर वो एक इशारा करदिया के अम्मा जान मैं तो रब के पास जारहा हूँ लेकिन बॉबी और स्वीटी को अछी फ़िज़ा से आशना कराना और उसको अछी से अछि तालीम देना और एक खूबरु साँचे में ढाल देना ताके तेरे बूढा पे की लाठी बन सके।

अगर तुम ना होते

में अपने मज़्मून का आग़ाज़ अपने शेर से करता चलूँ।।।
अगर तुम न होते ज़माना में कोई रंग न होता।
मैं न होता तुम न होते ये जहाँ न होता।
ये फूल न होता ये खुशबु न होती।
ये चाँद तारे आसमाँ न होता।

कहते हैं लोग एकदूसरे के बग़ैर जी नही सकता मुमकिन है के कोई ऐसा भी बंदये ख़ुदा इस काईंनत में कहीं न कहीं किसी गोशा में छिपा ठंडी साँसे लेरहा हो।

हाँ एक हबीब अपने मेहबूब को एक जंगल में तहे दिल से याद करता रहता पर उसे आज तक उस महबूब् का दीदार न हो स्का और आज भी वे अपने मेहबूब को उसी जंगल के एक गोशा में याद करता रहता के कभी न कभी उसकी दीदार ज़रूर होगी इस उम्मीद के साथ के उसका मेहबूब अचानक जलवा अफरूज़ होगा और उस के दीदार के साथ ही उसकी रूह ख़ुदा वंदे कुद्दूस के पास जा पहुंचेगी।

Wednesday, April 8, 2015

कफ़न

आज मेरे मज़्मून में तन के उस कपड़े  का ज़िकर होगा जो हर आदम के औलाद को इस रोये ज़मीन से कूंच करते वक़्त पेहेनना होता है चाहे वो जिस मज़हब का हो मर्द औरत बच्चे बुड्ढे जो हो सब को इस कपड़े की ज़रूरत लाज़िम आता है,
 
    मेने इस कपड़े को मौज़ेए बहस इसलिए बना या की ये एक इंसान केलिए ऐसा कपड़ा है जिसे हर कोई को कभी न कभी पहनना है सिवाए शहीदों के बता दूँ के जो शख्श खुदा के राह में या वतन के खातिर अपनी जान की क़ुरबानी देता है तो इस्लाम में उस केलिए उसी कपड़े में दो गज़ ज़मीन के तल जनाजह के नमाज़ के बाद दफन करदेने का हुकुम है लेकिन गैर इस्लाम में भी वतन के खातिर क़ुर्बान होने वाले शख़्स को उसी कपडे में चाहे तो जला दिया जाता है चाहे उसे उसके अक़ीदे के मुताबिक़ दफनादिया जा ता है।
 
      ये कपड़ा तक़रीबन हर मज़हब में सफ़ेद रंग का होता है जिसे हम कफ़न के नाम से जानते हैं, हाँ ये वही कफ़न है जो हर शख़्स को मरने के बाद नसीब होता है जिसका size  तक़रीबन 2 गज़ होता है, फिर उसे कंधे के सहारे क़ब्रिस्तान लेजाया जाता है और फिर ( मिन्हा ख़ल्कना कुम व फीहा नुईदुकूम व मिन्हा नुख्रिजुकुम तारत्न उखरा ) कहते हुए ज़मीन में दफन करदेते  हैं। ये जो brecket में लिखा हे ये क़ुरआन का एक टुकड़ा है, हाँ हिन्दू मज़हब में राम राम सततय कहते हुए श्मशान लेजाते हैं और वहाँ मुर्दे को जला कर राख को गंगा या किसी नदी में बहा देते हैं ता के उसके रूह को सुकून पहुंचे।

      हाँ इस कपड़े की हक़ीक़त भी जान्ना हमारे लये ख़ासा ज़रूरी है इतना तो ज़रूर हम जानते है की ये एक सफ़ेद कपड़ा होता है जीसे मय्यत को उढ़ा कर जला दिया जाता है या दफ़ना दया जाता है ..... लेकिन ऐसा क्यू क्या जाता है ये तो हमे भी नही पता लेकिन इतना तो हमे मालूम है की बरसो से ये रवायत चलती आरही है जिसको हम अपने अक़ीदे के हिसाब से अपने अम्ल में रख लिए हैं।

     एक बात दफन कफ़न के सिलसिले से ज़रूर गोष गुज़ार करदेना चाहता हूँ के कफ़न दफन का मोजिद कोन है(ईजाद करने वाला) तो आपको बताता चलूँ के  बाबा आदम के दो बीते थे उन दोनों को किसी बात पे बहसा बेसी हुई और एक ने ये फैसला करलिया की दोसरे को मार देना है और ऐसा ही हुआ जब क़ाबिल ने हाबिल को मार दिया तो अब सोचने लगा और इस फ़िक्र में पड़ग्या की इस मुर्दे का क्या करूँ तो अचानक आसमान से 2 कौवा (crow ) लड़ते हुए आरहा था तभी एक गिरा जैसे ही गिरा दोसर वाला crow आया और अपने चोंच से ज़मीन खुदा और उस crow को मिटटी के तल दबो दिया यही से कफ़न दफन का तरीक़ा शुरू हुआ इस्लाम में हाँ ये जो क़त्ल था ज़मीन पे सबसे पहला क़त्ल था।

     हाँ ये तो बताना भूल ही गया सफ़ेद कपड़ा अरब मुमालिक में शादी का जोड़ा होता है और ईसाई मज़हब में भी शादी के मुके पे सफ़ेद रंग के कपड़े में लड़कियां मइके से ससुराल कूंच करती है और कहीं कहीं जब बच्चा पैदा होता है तो  उसे भी सफ़ेद कपड़े पहनाते  हैं।।  
                         तो ये है कफ़न कभी ख़ुशी कभी गम

      इस हवाले से एक शेर कह कर  अपने मज़्मून(essay ) को आख़री कगार पर ला खड़ा करता हूँ।
         शेर..........
                   दुन्या गाड़ी का जक्शन है कोई आये कोई जाये
                    जीवन में कुछ और नही बस Tata Bye Bye

Tuesday, April 7, 2015

कफ़न

आया हूँ इस जहाँ में बस उम्मीदों के सहारे

खुशयाँ न दे सकूँ गर  उम्मीदों  के  सहारे

पल भर की ये ज़िंदग्गी है करना हे क्या हमें

बस हस्ते हुए  काटलेना हे  उम्मीदों के सहारे

वो जो आकाये हर ज़माना हे भेजा हे हमे

क्या करना हे  बताया हे उम्मीदों के सहारे

ये मतलब भरा दुन्या हे इससे क्या लेना हे देना

दो गज़ ज़मी के अंदर जाना हे उम्मीदों के सहारे

जब आएगा बुलावा रब्बे के पास से जाना ही पड़ेगा

लिपटे हुए कफ़न में ..जाना पड़ेगा कंधो के सहारे

ज़करिया ये ज़िन्दगी हे तेरी किस के सहारे........?

है ज़िन्दगी मेरी उम्मीदों के सहारे बस रब के सहारे।