Sunday, November 5, 2017

तुम मेरी हो...

तुम मेरी हो...


रात की चांदनी दिन का उजाला हो तुम. 
हो एक आइना सीशा हो तुम. 

मलक-ए- हुस्न  ख़्वाब  हो  तुम.
दिल की धड़कन एक राज़ हो तुम. 

एक ख़ूबसूरत अवाज़ सितार की राग हो तुम.
      हो क़ियाफा क़िनाअत हो तुम.

हो ज़रा बाल हट सी बाग़ की मुहाफ़िज़ हो तुम.
   हो  तबस्सुम मेरी  रुबाई  हो  तुम. 

हो क़ल्ब की मालिक ज़िंदगी की रदीफ़ हो तुम.
 ग़ज़ल की शैर हो मेरी तख़ल्लुस हो तुम.

यख़बस्ता राज़ हो ज़करिया की तुम.
       ज़ोया हो या हुमा हो तुम...?




2 comments: