Friday, August 26, 2016

“लफ़्ज़ों की हक़ीक़त”

मुख़्तसर अफ़साना


“लफ़्ज़ों की हक़ीक़त”
होशियारी से जादू दिखाऐ नये दौर के जादूगर
तूही पथ्थर अगर हो गई हमको इंसां बनाएगा कौन?
     

बर्फीली पहाड़ साच पास 
     जब तुझ से दूर होता हूँ न जाने तन्हाइयों मे बस तुम्हे ही याद करता हूँ  चाहे वो खुदा की इबादत क्यों न कर रहा होता हूँ... हाँ सुनों ख्वाब के लिए जब भी बिस्तर पर जाता हूँ तो बस तेरी ही बातें जबरन याद आती है लाख कोशिश करता हूँ की आज तुझे याद किये बगैर सो जाऊ पर मजबूर आखों से नींद कोसो दूर चली जाती पता नहीं क्यूँ तुम ख्यालों मे आती हो क्यों इतना मुझे मेरे दिल की धड़कन को तेज़ रफ्तार होने पे मजबूर करदेती हो| माना की मैं इतना खूबसूरत जिस्म वाला नहीं और पैसा भी नहीं मेरे पास पर ऐसा क्यों लगता है की तुम मुझे पसन्द करती हो मुझे हमेशा हमेशा के लिए अपना साया बनाना चाहती हो हाँ हो सकता है ये मेरी ख्वाब ख्याली हो पर मजबूर दिल बार बार यही दोहराता है की तुम मेरी हो मेरे लिए इस हसीन वादी मे आई हो मेरे सपने पूरे करने और मेरे जज्बातों को समझने और उसको अरशे मुअल्ला तक पहुँचाने मे मेरे शाना बशाना चलोगी ये मेरा अकीदा बनता जारहा है तुझपे| बस इसलिये की मेरी पूरी जिंदगी मे कोई ऐसा दोस्त नहीं मिला जो मेरे हर अच्छे बुरे काम पर नज़र रखता हो और उसकी इस्लाह करवाता हो भले ही तंज़िया अंदाज़ मे वक्फा वक्फा तम्बीह क्यों न करती हो की फलां गलती तुमने की है इसे सही करलो, लोग तुम्हे काम के ही वक्त याद करते हैं, इसका ख्याल रखो इससे इंसान के वक़ार मे कमी आती है, लोग इतने पाबन्द नहीं होते जितना तुम समझते हो वगैरह वगैरह.... खैर ये सारी बातें मोहतरमा समरीन की नसीहत थी(इस के लिए समरीन का शुक्रिया अदा करता हूँ) इन बातों से आपको इसलिए आशना कराया की अगर आपको भी ऐसा या ऐसी दोस्त मिलजाए तो समझ लीजिए आपकी भी जिंदगी इस नाचीज़ से कहीं ज़्यादा खुशगवार गुज़रेगी| अरे हाँ दो साल कैसे साथ बीता पता ही न चला खैर उनकी बातें गिनाता रहूँ या खुसूसियत आपके सामने ब्यान करता रहूँ तो शायद आपको एक और अफसाना “लफ्ज़ों के धोके बाज़ी” को नज़रे सानी करना पड़ेगा जो कहीं इससे ज़ियादा खूबसूरत अंदाज़ मे लिखा है मैंने|
खजियार की तस्वीर
         खैर ये सब बातें तो होती रहेगी बतादूँ के ये दोस्ती पहले नहीं थी मेरी उससे जब हुई दोस्ती जब उसने पहल किया दोस्ती का हाथ बढ़ा कर, मेरा उसका दो साल साथ पढ़ने जाना साथ एक बेंच पर बेठकर गौरसे टीचर्स का लेक्चर सुनना  साथ जरूरत के तहत घर से घरवाले की इजाज़त मिलने पर शोपिंग केलिए बाहर जाना, या मुझे सिलेबस से कुछ भी पढ़ना क्यों न हो एग्जाम के वक़्त सब उसकी मदद के बगैर नामुमकिन था भले ही वो इनकार करे पर थक हार के मेरी मासूमियत पर तरस खाकर पढ़ा कर ही दम लेती और बदले मे अच्छे न० का नज़राना मुझे मिलता जिसका मैं शुक्र गुज़ार हूँ, इतना ही नहीं मुझे या उसे सब्जेक्ट से रिलेटेड प्रोजेक्ट बनाना हो तो साथ बैठकर मिलजुल के बिना किसी तम्हीद अपने काम को अंजाम दिए बगैर अपने मक़अद को नहीं उठाते हम दोनों| और फिर एक शाम अचानक मेरे कानों मे एक बोझल सी आवाज़ सुनाई पड़ी की लड़का डॉक्टर है राजिस्थान मे पोस्टिंग है रहनेवाला अल्हाबाद का है अच्छे फैमिली से है हाँ भले ही बाद मे अमरीन भी हाँ भरते हुए कहने लगी लड़का डॉक्टर है और मुझे पसन्द भी है| भलेही ये रिश्ता कैन्सिल होग्या किसी ख़ास वजह से| बस किया था की मेरे पेरों तले ज़मीन खिसक गई फिर खुद को कोसने लगा तभी मेरे घरसे भी मेरे रिश्ते की खबर मोबाइल फ़ोन के ज़रये 3र्र्ड न० की अप्पी सुनाइ फिर क्या था की जले पर नमक जल्द ही असर करने लगा और मैं ग़म मे डूब गया पर समरीन अपनी शादी की खबर सुनाते हुए मुस्कुराई तो लगा की ये दोस्ती महज़ लफ्जों मे है हकीकत इसकी कुछ भी नहीं (बतादूँ के ये दोस्ती साफ़ और पाक थी, ,है और रहेगी) फिर खामोश जुबान और मुरझाया हुआ चहरा लिए इधर उधर फिरता रहा तभी उसने एक लम्बे सफ़र का प्लान सबके सामने उजागर किया जिसमे फैमिली के सारे मेम्बेर्स के साथ मैं भी इस ट्रिप का हिस्सा बना फिर तय्यारीयां शुरू होगई और 30मई2016 का टिकेट निकलवाने लखनऊ सिटी स्टेशन गया जहाँ पार्किंग वाले से झडप हुई गाड़ी पार्किंग को लेकर इत्तिफाकन उसवक्त मेरे साथ समरीन भी थी ज़रा डरा फिर सोचा प्रेस रिपोर्टर हूँ डरना किया झटसे अपने दोस्त पंकज को कॉल लगाया फिर क्या था की थोड़ीही देर में पार्किंग ठेकेदार आया और हाथ दाढ़ी पकड़ने लगा मैंने आगे इस तरह की झडप न करने की तम्बीह किया और घर केलिए निकल आया, ओह्ह ये बताना तो भूलही गया के ह्मलोगों का ट्रिप HP बर्फों की दुनिया जहाँ गर्मियों मे भी सर्दी का लुत्फ़ उठाने को मिलता है हो सके तो आप भी इस जगह को देख आइये, बता दूँ HP का स्विट्ज़रलैंड खजियार भी गया जहाँ चारो ओर पहाड़ और उसपर ऊँचे ऊँचे चीड़ और देवदार के दरख्त और बीच मे झील जिसकी ठंडी हवाओं के साथ खूब लुत्फ़ उठाया हम सब ने फिर दुसरे दिन अपने पनागाह dalhousi गौरव होटल रूम न०103 से साच पास 120km ज़मीन से 20000 फिट ऊंचाई एक पहाड़ से दुसरे पहाड़ दुसरे से तीसरे ऐसे ही अनगिनित पहाड़ों का सफ़र करता हुआ बर्फीली पहाड़ तक पहुंचा जहाँ साँस लेने मे भी परेशानियाँ होरही थी फिर भी हम सबने खूब मज़े किये और हजारों की तादाद मे सेल्फी और बैक कैमरे से बर्फीली पहाड़ों के साथ हमसब ने फोटो क़ैद किये, हाँ ये तो भूल ही ग्या जाते वक्त हम मे से कुछ ही लोग बचे होंगे जिसे पहाड़ों की तवाफ़ से उल्टियाँ न आई हो और बगेर उलटी के 20ह्ज़ार फिट ऊपर पहुंचे हो| कुदरत के बनाये हुए इस बर्फीली बाग़ के मुआइने से मन तो काफी खुश हुआ पर दिल को इत्मीनान हासिल न होसका तब मुझे लगा की शायद इस सफ़र का आगाज़ और इंतिहा खूबसूरत और यादगार रहेगा और हाँ बतादूँ ये सफ़र बड़ा ही दिलचस्प और हसीन सफ़र रहा पर मुझमे और समरीन में तब्दीली नहीं आई वापसी के बाद मुझे इग्नोर करना दिन बदिन बढ़ता रहा मैंने इस बारे मे स्वाल भी किया की क्यों आप मुझसे नज़रें नही मिलाती? क्यों नहीं मेरे लिखे अल्फाज़ का जवाब देतीं पहले की तरह? तो जवाब (Nhi भई aisa kuch nhi hai, Tum aisa q soch rhe ho, Nhi aisi koi bat nhi hai, Tum galat soch rhe ho.) बस यही जवाब पलटके आया तबसे अबतक न ही बाल के खाल उतारे ग्ये और न हीं दोस्ती के दरवाज़े ओपन हुए पहले जैसे| क्यों की न तो मेरे पास नौकरी है और न ही खूबसूरत जिस्म जो के आजकल की दोशीज़ाओं का फराज़ ख्याल है|
       खैर बात खत्म हुई जाते जाते आपको एक छोटासा मशवरा देता हूँ जरूर याद रखना अगर आपको या आपके किसी दोस्तों को ऐसा या ऐसी खैर दिल दोस्त किसी भी मोड़ पर मिले तो दोस्ती नहीं बलके मबनी (अटल) दिल दोस्ती करना उम्मीद है ऐसे दोस्त से कभी जुदा नही होगे न होनेदोगे भलेही मेरा और समरीन का रुख़ दोनों अलग दिशा के ओर चल पड़ा थोडेही वक्त बाद और मैं पहले की तरह तनहाई और बोझल सी दुनियाँ मे क़ैद होग्या और समरीन खूबसूरत वादी मे अपने खूबसूरत दोस्तों के साथ अपनी ख़ूबसूरती में  मगन होगई|
   
   
                                               


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