"मुहब्बत की अनदेखी कहानी"
तेरा ईमान जाने और तू जाने तेरा उसूल क्या है।तेरा आख़री कलाम कशकोल से कम नहीं है।अल्फ़ाज़ की गिनतियां गर जहां में शुमार होजए तो मेहबूब की बस्तियों में ख़ुमार सा छाजाएगा।तेरे दरया दिली के बारे में क्या कहूँ उस्मान की तरह मालूम होता है। तुम्हारी एक बात यहाँ याद आरही है। जो के एक राज़ की है। तुम्हे पता है वो कलाम-ए-इश्क़ जो हम रात रात भर क्या करते थे। जब हम सोने को बेड पर जाते तो तुम झिंझोड़ देती ये कहते हुए की जनाब पहले कलाम-ए-इश्क़ तो करये फिर ख़्वाब की आगोश में जाइयेगा। और फिर एक दूसरे के कंधे पे आप के बाज़ू का कुछ हिस्सा रखकर गुफ़्तगू का सिलसिला शरू करते हुए नींद की आगोश में चले जाते थे।
एक दिन अचानक जब हमदोनों गिहरी नींद में थे की कोई दरवाज़ा ज़ोर ज़ोर से नॉक करने लगा। जैसे तैसे जाके दरवाज़ा खोला तो वही हसीन से चेहरा मेरे सामने रूबरू खड़ी कुछ बोले जा रही थी। पर मेरी नज़रें उसके मुबारक चेहरे पर टिकी हुई थी। फिर किया था उसने उसने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में एक थप्पड़ मेरी गालों पर रसीद करदी।😂 मैं चौंका ओर फिर बोला मोहतरमा आईये तशरीफ़ लाईये अंदर।और वो अंदर जाके अम्मी के पास बैठ गई।और उनसे बातें करने लगी। घर मे मैं अम्मी और छोटा भाई ही उसवक्त मौजूद था। बाक़ी सब दार्जलिंग टूर पर गए हुए थे।
फिर मैं जलदी से अम्मी के कहने पर नाश्ता उसके सामने लगाया फिर चाय की प्याली उसके सामने रख दिया। और मैं कॉलेज केलए गाड़ी निकालते हुए अम्मी से दुआ लिया और क्लास केलिये निकल गया। तबसे अबतक न मैं ख़्वाब उसे देखा और नहीं उसे हक़ीक़त में देखा। शायद वो इंसान नुमा फरिश्ता थी जो आई और फिर नहीं दिखी। हां वही सूरत वही लहजा वही क़द्द o कामत वही चाँद सा हसीन चहरा मुझे एक ख़ास परी नुमा मलका मुझे कुछ अरसे बाद नज़र आई है। जो आज मेरी खुशी और हस्ते खिलते हुए चहरे को मुनोव्वेर बनाये रहती है।ख़ुदा सलामत रखे उसे आमीन😊और जल्द ही जिसके क़ल्मों आप सब रूबरू होंगे।
#zakariya

No comments:
Post a Comment