Wednesday, November 22, 2017

महकती कलियाँ....


महकती कलियाँ....!

इल्म एक ऐसा फूल है जो जितना ज़्यादा खिलता है उतनी ज़्यादा खुशबू देता है...!

खुर्द ज़मीन से वो चीजें नहीं देखी जासकती जो आंसुओं से ज़ाहिर होती है...!

मुहब्बत मुश्किलात की सीढ़ी है और हंसी राहे हयात का राग है...!

कहते हैं झूठ दम घुटने वाला धूल है तो हौसला कामियाबी की अलामत है...!

कहा जाता है दोस्त चुन्ने में बहुत एहतियात से काम लिया जाना चाहिए...!

क्यूंकि दोस्त ज़िन्दगी का बेहतरीन और क़ीमती             सरमाया है...!

हमने बड़ों से सुना है जो अक़्लमंद है वे फ़िक्र की गहराइयों में डूब कर दानिश की मोती पैदा करता है..!
और
सुना है इंसानियत बेश बहा खज़ाना है हमें चाहिए कि उसे लिबास में नहीं इंसान में तलाश करें...!☺


Thursday, November 16, 2017

दास्तान आलियांन की.....☺



दास्तान आलियांन की....☺?
Part1
रंजीदा पलकें खुशक आँखें खमोश होंट सुन सान रातें बेसहारा अकेला एक कमरे में रात की तिहाई हिस्से में अपनी ज़िंदगी के वो ख़ुश मिजाज़ पल की तलाश में कमरे की छत की ओर टकटकी निगाहों से किसी के ख़्वाब में आने की इंतज़ार कररहा आलियांन ख़ुद ही ख़ुद में टप टपा रहा था।शायद आलियांन किसी की कही बातों पे ग़ौर कररहा था या फिर अपनी इस ज़िंदगी को किसी केलिये क़ुर्बानी का सोच रहा था।
 
     नहीं दरअसल आज वो अपने ही खून की हक़ीक़त बोल पे काफ़ी रंजीदा था। या शायद उसे किसी ने झूठा मक्कार या सब को घर मे लड़ाई करवाने और अपने ही घर से सबको अलग करवाने का ज़िम्मेदार ,मुल्ज़िम और क़ुसूवार बताया जो आलियांन किसी आपनो से सुन्ने की उम्मीद नहीं रखा था। या फिर कुछ और हाँ मुमकिन है पर हक़ीक़त कहीं इससे बहुत मेने एक शेर लिखा था जब किसी अपने ने एक बात कही थी।
शेर....
      आलियांन की इस दास्तान के पीछे एक लम्बी कहानी है। जो हम आप को बाद में बताएंगे। लेकिन इस से पहले हम आलियांन का बचपना फिर उम्र के खिलते पल फिर मुरझाते रंग और फिर ख़ूबसूरत पल।

     चलये शुरू करतें आलियांन के बचपने से आलियांन का बचपना यूँ था....... जैसे मखमली गुलाब के पेड़ में खिलता गुलाब।
         एक दिनका वाकिया है आलियांन अपने गांव में अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था। वेसे तो आलियांन न गांव और न ही बाहर किसी को अपना अबतक दोस्त बनाया है।ख़ैर आलियांन दोस्तों के साथ खेल रहा था। तभी उसकी माँ बच्चों के बीच से आलियांन को खदेड़ती हुई आँगन लेकर आई और जल्दी से नहा धुलाकर ईद का कपड़ा पहना कर अपने बड़े बेटे मरजान के साथ अचानक शहर रवाना करदि।
        आलियांन ज़रा अचम्भा था इस मसले को लेकर लेकिन दिल ही दिल में सोच रहा था कि देखो किस्मत आभी गांव में था अब शहर की  आब ओ हवा में डुबकी लगाने जरहा हूँ। क्या किस्मत हमने पाई है...?
     आलियांन तक़रीबन 4घण्टे में शहर पहुंच ग्या। हाँ एक और अहम बात आलियांन उर्दू हिंन्दी बोलना नहीं जानता सिवाए अपने माद्री ज़ुबान के बड़े भाई मरजान ने आलियांन को रास्ते भर में ज़रूरत के मुताबिक़ दोनों ज़ुबानें बोलना सीखा दिया। चूंकि ये मजबूरी भी थी उनकी के अगर वो आलियांन को नहीं सिखाते तो उनके छोटे भाई को  दिहति बद्दी जैसे अल्फ़ाज़ नवाज़ते शाय इसलिए  उन्हें ज़हमत उठानी पड़ी।
   फिर किया था आलियांन मस्ती में अब्बू जान और भाईजान के साथ रहने लगा। हाँ आलियांन उस जगह  रहने और पढ़ने ग्या था जिस शहर का आप सभी लीचियाँ ख़ूब पसन्द करते हैं।
         बाक़ी अगले पार्ट में आप पढ़ेंगे क्या अगली कहानी आलियांन की...........

Wednesday, November 15, 2017



Caption please.....,😃
मैं अच्छा हूँ नहीं अच्छा लगूं कैसे किसी को।
मैं प्यारा हूँ नहीं प्यारा लागूं कैसे किसी को।

फैसला है तेरे हाथ में है फैसला तू ही कर।
हो अगर आदिल तो फैसला आदिलाना तू ही कर।

लोग ये कहते हैं की ज़करिया पछतायेगा।
ठीक है मर्ज़िए खुदा होगा तो पछताऐगा।

Sunday, November 5, 2017

तुम मेरी हो...

तुम मेरी हो...


रात की चांदनी दिन का उजाला हो तुम. 
हो एक आइना सीशा हो तुम. 

मलक-ए- हुस्न  ख़्वाब  हो  तुम.
दिल की धड़कन एक राज़ हो तुम. 

एक ख़ूबसूरत अवाज़ सितार की राग हो तुम.
      हो क़ियाफा क़िनाअत हो तुम.

हो ज़रा बाल हट सी बाग़ की मुहाफ़िज़ हो तुम.
   हो  तबस्सुम मेरी  रुबाई  हो  तुम. 

हो क़ल्ब की मालिक ज़िंदगी की रदीफ़ हो तुम.
 ग़ज़ल की शैर हो मेरी तख़ल्लुस हो तुम.

यख़बस्ता राज़ हो ज़करिया की तुम.
       ज़ोया हो या हुमा हो तुम...?




ख़्याल....

(part 1)
अब तुम भी प्यार करने लगी हो.
 हमारे क़रीब आने लगी हो. 

अब ऐसा लगने लगा है जहाँ गौद है मेरे
तुम दूर थी बहुत क़रीब आने लगी हो.

हर ख़ुशी हर राज़ तेरे गौद में है.
यही न तुम बेहद क़रीब आने लगी हो. 

एक सवाल है तुमसे..?

इतने दिनों से इतनी दूर कियूं थी तू?
पता है मुझे दूर रहकर क़रीब आने लगी हो. 

हाँ ये बताओ प्यार जब नहीं था मुझपे क्या?
पहले दूर रहकर अब क़रीब आने लगी लगी हो. 

सुनों..... 
नाज़ है मुझे की तुम मुहब्बत करती हो.
अब तुम मुहब्बत करती हो जब से मैं कररहा हूँ.