Sunday, February 4, 2018

دنیا محبت کی دشمن ہے...

   दुनिया मोहब्बत की दुश्मन है....❓

बचपन से दुनिया से सुनते आते हैं "मोहब्बत ग़लत नहीँ होती ,मोहब्बत करने वाले ग़लत होते हैं" जो मौह्ब्ब्त को टाइम पास का ज़रिया समझते हैं| मोहब्बत किसी से करते हैं और शादी किसी और से! मोहब्बत को एक मज़ाक़ समझते हैं और दुनिया की नज़रों में भी उसे एक मज़ाक़ बना देते हैं , हमेशा सबसे सुना कि मोहब्बत करो पर उस रब से और उसके उस बन्दे से जो तुम्हारी इज्जत करना जानता हो , जो तुमसे मोहब्बत करे तो तुम्हें अपनी इज्जत बनाये न कि बाज़ारों और पार्कौ की रौनक। और इन सब के बाद जब हमें ऐसा कोई मिल जाता है जो शराफत के साथ हमें अपनी इज्जत बनाना चाहता है तो ये दुनिया उस पाक मोहब्बत का मज़ाक़ बना देती है , कभी कोई दुनयावी बंदिशें राह में रुकावट बन जाती हैं तो कभी कोई रीति रिवाज आड़े आ जाता है। क्या ये दुनिया एक इंसान को उसकी शराफ़त, मोहब्बत, उसके किरदार से परख नहीँ सकती?? क्यूँ मोहब्बत की तक़मील इतनी मुश्किल कर देती है कि इंसान उस मोहब्बत का मज़ाक़ बनते अपनी आँखों से देखता है और बेबस होता है, कुछ भी करने से क़ासिर ?? और फ़िर यही दुनिया कहती है "मोहब्बत ग़लत नहीँ होती, मोहब्बत करने वाले ग़लत होते हैं।".

"دنیا محبت کی دشمن ہے"
بچپن سے دنیا سے سنتے آتے ہیں ’’محبت غلط نہیں ہوتی محبت کرنے والے غلط ہوتے ہیں‘‘ جو محبت کو وقت گزاری کا ذریعہ سمجھتے ہیں۔ محبت کسی سے کرتے ہیں اور شادی کسی اور سے۔ محبت کو ایک مذاق سمجھتے ہیں اور دنیا کی نظروں میں بھی اسے ایک مذاق بنا دیتے ہیں۔ ہمیشہ سب سے سنا کہ محبت کرو پر اس رب سے اور اس کے اس بندے سے جو تمہاری عزّت کرنا جانتا ہو، جو تم سے محبت کرے تو تمہیں اپنی عزّت بناۓ نہ کہ بازاروں اور پارکوں کی رونق،اور ان سب کے بعد جب ہمیں ایسا کوئی مل جاتا ہے جو شرافت کے ساتھ ہمیں اپنی عزّت بنانا چاہتا ہے تو یہ دنیا اس پاک محبت کا مذاق بنا دیتی ہے، کبھی کوئی دنیاوی بندشیں راہ میں رکاوٹ بن جاتی ہیں تو کبھی کوئی ریتی رواج آڑے آ جاتا ہے۔ کیا یہ دنیا ایک انسان کو اس کی شرافت، محبت، اس کے کردار سے پرکھ نہیں سکتی؟؟ کیوں محبت کی تکمیل اتنی مشکل کر دیتی ہے کہ انسان اس محبت کا مزاق بنتے اپنی آنکھوں سے دیکھتا ہے اور بےبس ہوتا ہے، کچھ بھی کرنے سے قاصر؟؟ اور پھر یہی دنیا کہتی ہے’’ محبت غلط نہیں ہوتی، محبت کرنے والے غلط ہوتے ہیں‘‘۔
۔#Zoya


Sunday, January 14, 2018

"मुहब्बत की अनदेखी कहानी"


"मुहब्बत की अनदेखी कहानी"

तेरा ईमान जाने और तू जाने तेरा उसूल क्या है।तेरा आख़री कलाम  कशकोल से कम नहीं है।अल्फ़ाज़ की गिनतियां गर जहां में शुमार होजए तो मेहबूब की बस्तियों में ख़ुमार सा छाजाएगा।तेरे दरया दिली के बारे में क्या कहूँ उस्मान की तरह मालूम होता है। तुम्हारी एक बात यहाँ याद आरही है। जो के एक राज़ की है। तुम्हे पता है वो कलाम-ए-इश्क़ जो हम रात रात भर क्या करते थे। जब हम सोने को बेड पर जाते तो तुम झिंझोड़ देती ये कहते हुए की जनाब पहले कलाम-ए-इश्क़ तो करये फिर ख़्वाब की आगोश में जाइयेगा। और फिर एक दूसरे के कंधे पे आप के बाज़ू का कुछ हिस्सा रखकर गुफ़्तगू का सिलसिला शरू करते हुए नींद की आगोश में चले जाते थे। 
  एक दिन अचानक जब हमदोनों गिहरी नींद में थे की कोई दरवाज़ा ज़ोर ज़ोर से नॉक करने लगा। जैसे तैसे जाके दरवाज़ा खोला तो वही हसीन से चेहरा मेरे सामने रूबरू  खड़ी कुछ बोले जा रही थी। पर मेरी नज़रें उसके मुबारक चेहरे पर टिकी हुई थी। फिर किया था उसने उसने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में एक थप्पड़ मेरी गालों पर रसीद करदी।😂 मैं चौंका ओर फिर बोला मोहतरमा आईये तशरीफ़ लाईये अंदर।और वो अंदर जाके अम्मी के पास बैठ गई।और उनसे बातें करने लगी। घर मे मैं अम्मी और छोटा भाई ही उसवक्त मौजूद था। बाक़ी सब दार्जलिंग टूर पर गए हुए थे। 
  फिर मैं जलदी से अम्मी के कहने पर नाश्ता उसके सामने लगाया फिर चाय की प्याली उसके सामने रख दिया। और मैं कॉलेज केलए गाड़ी निकालते हुए अम्मी से दुआ लिया और क्लास केलिये निकल गया। तबसे अबतक न मैं ख़्वाब उसे देखा और नहीं उसे हक़ीक़त में देखा। शायद वो इंसान नुमा फरिश्ता थी जो आई और फिर नहीं दिखी। हां वही सूरत वही लहजा वही क़द्द o कामत वही चाँद सा हसीन चहरा मुझे एक ख़ास परी नुमा मलका मुझे कुछ अरसे बाद नज़र आई है। जो आज मेरी खुशी और हस्ते खिलते हुए चहरे को मुनोव्वेर बनाये रहती है।ख़ुदा सलामत रखे उसे आमीन😊और जल्द ही जिसके क़ल्मों आप सब रूबरू होंगे।

#zakariya






                                                             رنگ کیوں اب اتر نہیں جاتاــــــــ
                                                            عشق سے کھیلے تو زمانے ہوےُ


                                                     زویا۔احترام۔تمنّؔا#




Wednesday, November 22, 2017

महकती कलियाँ....


महकती कलियाँ....!

इल्म एक ऐसा फूल है जो जितना ज़्यादा खिलता है उतनी ज़्यादा खुशबू देता है...!

खुर्द ज़मीन से वो चीजें नहीं देखी जासकती जो आंसुओं से ज़ाहिर होती है...!

मुहब्बत मुश्किलात की सीढ़ी है और हंसी राहे हयात का राग है...!

कहते हैं झूठ दम घुटने वाला धूल है तो हौसला कामियाबी की अलामत है...!

कहा जाता है दोस्त चुन्ने में बहुत एहतियात से काम लिया जाना चाहिए...!

क्यूंकि दोस्त ज़िन्दगी का बेहतरीन और क़ीमती             सरमाया है...!

हमने बड़ों से सुना है जो अक़्लमंद है वे फ़िक्र की गहराइयों में डूब कर दानिश की मोती पैदा करता है..!
और
सुना है इंसानियत बेश बहा खज़ाना है हमें चाहिए कि उसे लिबास में नहीं इंसान में तलाश करें...!☺


Thursday, November 16, 2017

दास्तान आलियांन की.....☺



दास्तान आलियांन की....☺?
Part1
रंजीदा पलकें खुशक आँखें खमोश होंट सुन सान रातें बेसहारा अकेला एक कमरे में रात की तिहाई हिस्से में अपनी ज़िंदगी के वो ख़ुश मिजाज़ पल की तलाश में कमरे की छत की ओर टकटकी निगाहों से किसी के ख़्वाब में आने की इंतज़ार कररहा आलियांन ख़ुद ही ख़ुद में टप टपा रहा था।शायद आलियांन किसी की कही बातों पे ग़ौर कररहा था या फिर अपनी इस ज़िंदगी को किसी केलिये क़ुर्बानी का सोच रहा था।
 
     नहीं दरअसल आज वो अपने ही खून की हक़ीक़त बोल पे काफ़ी रंजीदा था। या शायद उसे किसी ने झूठा मक्कार या सब को घर मे लड़ाई करवाने और अपने ही घर से सबको अलग करवाने का ज़िम्मेदार ,मुल्ज़िम और क़ुसूवार बताया जो आलियांन किसी आपनो से सुन्ने की उम्मीद नहीं रखा था। या फिर कुछ और हाँ मुमकिन है पर हक़ीक़त कहीं इससे बहुत मेने एक शेर लिखा था जब किसी अपने ने एक बात कही थी।
शेर....
      आलियांन की इस दास्तान के पीछे एक लम्बी कहानी है। जो हम आप को बाद में बताएंगे। लेकिन इस से पहले हम आलियांन का बचपना फिर उम्र के खिलते पल फिर मुरझाते रंग और फिर ख़ूबसूरत पल।

     चलये शुरू करतें आलियांन के बचपने से आलियांन का बचपना यूँ था....... जैसे मखमली गुलाब के पेड़ में खिलता गुलाब।
         एक दिनका वाकिया है आलियांन अपने गांव में अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था। वेसे तो आलियांन न गांव और न ही बाहर किसी को अपना अबतक दोस्त बनाया है।ख़ैर आलियांन दोस्तों के साथ खेल रहा था। तभी उसकी माँ बच्चों के बीच से आलियांन को खदेड़ती हुई आँगन लेकर आई और जल्दी से नहा धुलाकर ईद का कपड़ा पहना कर अपने बड़े बेटे मरजान के साथ अचानक शहर रवाना करदि।
        आलियांन ज़रा अचम्भा था इस मसले को लेकर लेकिन दिल ही दिल में सोच रहा था कि देखो किस्मत आभी गांव में था अब शहर की  आब ओ हवा में डुबकी लगाने जरहा हूँ। क्या किस्मत हमने पाई है...?
     आलियांन तक़रीबन 4घण्टे में शहर पहुंच ग्या। हाँ एक और अहम बात आलियांन उर्दू हिंन्दी बोलना नहीं जानता सिवाए अपने माद्री ज़ुबान के बड़े भाई मरजान ने आलियांन को रास्ते भर में ज़रूरत के मुताबिक़ दोनों ज़ुबानें बोलना सीखा दिया। चूंकि ये मजबूरी भी थी उनकी के अगर वो आलियांन को नहीं सिखाते तो उनके छोटे भाई को  दिहति बद्दी जैसे अल्फ़ाज़ नवाज़ते शाय इसलिए  उन्हें ज़हमत उठानी पड़ी।
   फिर किया था आलियांन मस्ती में अब्बू जान और भाईजान के साथ रहने लगा। हाँ आलियांन उस जगह  रहने और पढ़ने ग्या था जिस शहर का आप सभी लीचियाँ ख़ूब पसन्द करते हैं।
         बाक़ी अगले पार्ट में आप पढ़ेंगे क्या अगली कहानी आलियांन की...........