KHUSH AAMDEED Aaiye bhatakte hai'n lafzo'n ki galiyo'n me'n or khoj nikalte hai'n ZOYA EHTRAM or ZAKARIYA FARMANI ke qalam se likhi kch aisi kahaniya'n, ghazle'n or nazm jo apke dil me'n utar jayegi, apke jazbat ko jhinjhod degi, kbhi hnsayegi to kbhi kbhi rulayegi, jin me'n aapko apna aap nazar ayega.....thodi aawargi, zra sa deewanapan, kahin mohabbat ke saye to kahin nafrat ki dhup, kahin khud aap to kahin apke samne basne wala koi roop..........
Friday, September 4, 2015
बन्द कमरे में क़ैद मुहब्बत
- दुनियां की इस हसीं वादि में सब खुश नज़र आते है कोई भी ऐसा नही जिसके हक़ में ये हक़ीर कुछ शिकायत कर ने पे मजबूर हो।
खैर ये दुनियां फानी है एक दिन इस खूबसूरत वादी को छोड़के कहीं दूर चला जाना है जहाँ न ऐसा हसीं मन्ज़र देखने को मिलेगा और न ही ऐसे दोस्त यार जिससे हम अपने दिल की बात share कर सकें खैर दोस्त की बात सामने आई तो एक शिकायत भी यार की याद आगई .... किसी ज़माने में जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे तब मेरा एक दोस्त अब्दुल कुद्दूस हुआ करता था जो नेहायत शरीफ़ और ज़हीन लड़का था जिसकी चर्चा स्कूल भर में खूब हुआ करती थी और एक मैं था जिसे बच्चे हेकारत की नज़रों से देखा करते थे.
हाँ आपने एक कहावत सुनी होगी बन्दा मरता न क्या करता ये कहावत बिलकुल मुझपे फिट बैठति थी उस वक़्त भी और आज भी कभी कभी ये महसूस होता है लेकिन आदत सी होगई है इनसब बातोँ को सुनने की।
इस दोस्ती पे 1 छोटी सी कहानी याद आती है जिसे आपको सुनादेना मुनासिब समझता हूँ ....!
किसी जंगल में 1 हाथी रहता था जिसको दोस्ती करने का बहुत शौक़ था वो बेचारा जंगल से कहीं दूर किसी नदी के किनारे गया वहाँ 1 मेढंक नज़र आया उसे देखके हाथी दिल ही दिल में बहुत खुश हुआ फिर हाथी ने अपने दोस्ती का पैग़ाम मेढंक को पेश किया उसने बड़े घटिया अल्फ़ाज़ में बोला तूने अपने शरीर को देखा है जो मुझसे दोस्ती करने को आटपका में अगर तेरे पाऊं के नीचे चला गया तो मेरा तो क्चम्मर निकल जायेगा,
ये बात सुनतेही हाथी मायूस होके आगे बढ़ा फिर क्या देखता है की 1 लोमड़ी नज़र आई जो नेहायत शरीर और चालाक थी फिर हाथी ने वही बात दोहरायी जो मेढंक से कही थी और फिर क्या था के उसे वहाँ भी मायूसी मिली..
खैर इस दोस्ती को यहीँ रोक के अब्दुल क़ुद्दूस की दोस्ती के बारे मे बताता चलूँ जिसकी दोस्ती इसी से मिलती जुलती है।
अब्द.... को भी बहुत शौक़ था दोस्ती करने का वो भी अपने अरमान को लेकर उस वादी की तरफ़ बढ़ा जहाँ लोग इस दोस्ती को प्यार मुहब्बत से भी ताबीर देते हैं ,अब्दुल कुद्दूस ने वही किया जो हाथी ने क्या था बस फ़रक़ इतना था के हाथी को इब्तदा ही में मायूसी मिली और अब्दुलक़ुद्दूस को कुछ अरसा बाद।
अब्दुलक़ुद्दूस की मेहबूब से शिकायत भरी कहानी कुछ यूं है ........जब वो highschool में था तो उसे भी दोस्ती करने का जूनून सवार हुआ और वो जूनून दिलकी गेहराई से थी उसने एक लड़की के सामने अपनी दोस्ती का पैगाम रखा वो लड़की उसी लोमड़ी की तरह अय्यार और चालाक थी उसने बगैर ताख़ीर किये अब्दुलक़ुद्दूस की दोस्ती को क़ुबूल करली फिर क्या था की ये दोस्ती काफ़ी अरसा तक 1मज़बूत डोर की तरह एक दोसरे से बधि रही ...
बेचारा उस मक्कारी भरी दोस्ती को समझ न स्का और हर वो चीज़ उससे share करता रहा जो शायद उसे नही करनी चाहिये थी लेकिन वो अपनी दोस्ती पे यक़ीन रखता था शायद इसी लिये अपने दिल की हर बात बता देता था और वो लड़की हर उस बात को इस तरह सुनती जैसे 1 मुख्लिस दोस्त सुनता और समझता है।
इसी तरह वक़्त गुज़रता, रहा रातें कटती रही, सवेरा होता रहा, दिन ढलता रहा,, और एकतरफा दोस्ती का बन्धन अपने ऊरुज के ओर तेज़ी से कुँच करतारहा, ऐसी दोस्ती जिसके बारे मे शायद किसी को पता न हो के ये दोनों एक दूसरे केलिये हर वो क़दम उठा सकता है जो नही उठानी चाहिये लेकिन शायद लोगों को ये नही पता था की अब्दुल कुद्दूस की दोस्ती 1 अय्यार लड़की से है जो महज़ अपने मतलब के लिये दोस्ती बनाये रखी है..
हाँ तो मैं ये बताता चलूँ के... ये दोस्ती का चादर दोनों औढ़ के बहुत दूर का सफ़र तै कर चूका था जहाँ से वापिस आना बड़ा ही मुश्किल का काम था। लेकिन ये दोस्ती वक़्त के साथ साथ अपना रुख़ भी बदल रहा था....जैसे बरसात में नदियां रुख़ बदलती है अपने पेट में ज़ियादह पानी भरने की वजह से बस ठीक इसी तरह अब्दुलक़ुद्दूस की अय्यार दोस्त जिसे अब ये मुहब्बत करने लगा था वो भी अपने रुख को ज़ियादह दुलार प्यार पाने की वजह से बदलने लगी, इसलिये किसीने सही कहा है के किसी को इतना न चाहो के वो चाहत तेरी मजबूरी बनजाये सही बात है के ये दोस्ती बड़ी महैंगी पड़ी बेचारा मजनू दोस्त को.....
अब मैं अय्यर लड़की का कारनामा सुनाता चलूँ अय्यार के बदलते रुख को अब्द....देख नही सकता था इसी लिये उसने अपने आपको दूर रहने की कोशिश मे लगगया ताके उस मक्कार की मक्कारी से दूर रहस्के तो अब्द.....ने ignore करना शुरू करदिया अपनी महबूबा को जो किसी ज़माने मे दोस्त थी अब वो काफी आगे आचूका था पढ़ाई भी उसकी 1साल में मुकम्मल होने वाली थी आगे उसका इंट्रेंस भी था किसी चीज़ का इसलिये भी वो और दुरी इख़्तियार करने लगा चूँके पता था के ये तो अपनी शादी रचा के अपने मैके से सुसराल का सफर बख़ुशी तै करलेगी लेकिन मैं यहीं का यहीं रहजाऊंगा इसीलिये
इसी लिये वो सुबह घर से University केलिये निकल जाता और शाम को बन्द कमरे मे खुदको क़ैद करलेता.
इसी तरह वक़्त कटता रहा और प्यार 1 तरफ घटता रहा दूसरी तरफ बढ़ता रहा हाँ इसी दरमियान महबूबा की शादी भी लग्गई बेचारा को जब मालूम हुआ तो अपने मायूस दिल को खुश करने मे लग्गया तभी शादी के date fix होजाने की खबर मिली के February के 1st week मे शादी होने वाली है......
तभी अब्दुलक़ुद्दूस ये शेर पढ़ता हुआ दूसरी दुन्या मे गुम(खोग्या) होगया और आज तक नही नज़र आया..
शेर....
होकर उसी के पास ही क्या बात हो गई
मैं देखता रहा उसे और रात हो गई
पहली नज़र मिली तो हंसे जारहे थे वो
इस तरहे उनसे प्यार की इख़्तताम(end) होगई
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